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इलाहाबाद हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्णय: दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा केवल कानूनी पत्नी कर सकती है

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Posted On:Wednesday, December 17, 2025

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा केवल वैध रूप से विवाहिता महिला कर सकती है। यदि किसी महिला का पहला विवाह वैध है और उसने बिना विधिवत तलाक लिए किसी अन्य पुरुष के साथ रहना शुरू किया है, तो वह उस व्यक्ति से भरण-पोषण की मांग करने की हकदार नहीं होगी।कोर्ट ने कहा कि केवल लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ संबंध में रहने से महिला को पत्नी का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं होता। जब तक पहला विवाह विधिवत रूप से समाप्त न हो और दूसरी शादी कानून के अनुसार न की जाए, तब तक धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा स्वीकार्य नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में याची का पहला विवाह 29 अप्रैल 1992 को हुआ था और इससे उसके दो बच्चे हैं। विवाद के बाद दोनों पति-पत्नी अलग रहने लगे। इस दौरान याची का संपर्क उन्नाव में प्रैक्टिस कर रहे एक वकील से हुआ और कथित रूप से उसने 2009 में उससे विवाह कर लिया। लगभग 10 साल तक दोनों साथ रहने के बाद विवाद बढ़ गया और 2018 में याची ने भरण-पोषण की मांग दायर की।

हालांकि, अदालतों ने याची की याचिका खारिज कर दी। परिवार अदालत ने यह स्पष्ट किया कि याची कानूनी पत्नी नहीं है और इसलिए धारा 125 के तहत उसका दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

परिवार अदालत का आदेश बरकरार

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने कानपुर की अतिरिक्त परिवार न्यायालय-2 के 12 फरवरी 2024 के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। परिवार अदालत ने पहले ही आदेश में स्पष्ट कहा था कि याची कानूनी पत्नी नहीं है और इसलिए उसे भरण-पोषण का हक नहीं है।

नोटरी समझौते से तलाक मान्य नहीं

याची ने तर्क दिया कि उसने पहले विवाह को आपसी सहमति और नोटरीकृत दस्तावेज के माध्यम से समाप्त कर दिया। हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया और कहा कि ऐसे नोटरी समझौते से विवाह का कानूनी रूप से अंत नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले विवाह के अस्तित्व के बारे में अज्ञानता स्वीकार्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के सविताबेन सोमाभाई भाटिया बनाम गुजरात राज्य (2005) के फैसले का हवाला दिया। इस निर्णय में स्पष्ट किया गया था कि अवैध विवाह से जुड़ी महिला को पत्नी की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता और इसलिए वह भरण-पोषण की पात्र नहीं होती।

कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि कानून की दृष्टि से केवल वैध विवाहिता महिला ही अपने पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है। अवैध या अस्थायी संबंध रखने वाली महिला को यह अधिकार नहीं प्राप्त है।


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